हरतालिका तीज : अधूरी ख्वाहिशें

हरतालिका तीज : अधूरी ख्वाहिशें, hartalika teej poem
हरतालिका तीज : अधूरी ख्वाहिशें

तीज़ का नाम आते ही आज भी आँखों के सामने बचपन का वही दृश्य तैर जाता है।

एक दिन पहले ही घर में उत्सव-सी रौनक छा जाती।

माँ रसोई में तरह-तरह के पकवान बना लेतीं,

ताकि व्रत के दिन किसी को तकलीफ़ न हो।

पापा हमें समझाते—

“कल माँ को परेशान मत करना,

खाने में नखरे मत करना।

वो खुद भूखी रहकर हम सबको खिलाती है,

इसीलिए माँ अन्नपूर्णा कहलाती है।”

उनकी आवाज़ में माँ के लिए जो सम्मान और अपनापन झलकता था,

वो हमें बचपन से ही सिखाता रहा

कि यह दिन दरअसल माँ और पापा का है।

पापा का व्यवहार और उनकी चिंता देखकर लगता,

यह व्रत केवल स्त्रियों का नहीं,

बल्कि पति-पत्नी के प्रेम का पर्व है।

उस उम्र में मैं माँ के साथ उनकी सहेली के घर पूजा में जाया करती थी।

वहाँ सुंदर-सुंदर मिट्टी के शंकर-पार्वती सजाए जाते।

माँ की सहेलियाँ, मेरी आंटिया मुझे देख मुस्कराकर कहतीं—

“अरे, तू भी पूजा कर ले, अच्छा वर मिलेगा।”

और मैं हठीली मासूमियत से जवाब देती—

“भगवान अगर मुझे अच्छा वर देंगे,

तो मैं खुद उसके लिए पूजा करूँगी।”

लेकिन भीतर ही भीतर एक मासूम ख्वाहिश पलती रही —

क्यों माँ इतनी थोड़ी-सी मेहंदी लगाती हैं?

मैं तो खूब मेहंदी लगवाऊँगी अपने दूल्हे से…

हाथों में रंग भरवाऊँगी, दुल्हन-सी सजूँगी।

हर साल तीज़ पर अपने पति से माँग में सिंदूर डलवाऊँगी।

क्योंकि वो सिंदूर ही तो होगा,

जो सालभर की थकान, शिकवे-शिकायत सब धो देगा,

और हमें फिर से उसी पल में लौटा देगा

जब हम नए दूल्हा-दुल्हन बनकर एक-दूसरे की ज़िंदगी में आए थे।

वो सिंदूर ही होगा

जो रिश्ते की मिठास को फिर से ताज़गी से भर देगा,

मानो नया-नया ब्याहा हुआ जोड़ा हो।

समय पंख लगाकर उड़ गया।

कॉलेज की पढ़ाई के लिए घर से दूर चली गई,

फिर भी तीज़ के दिन से पहले पापा का फोन आना तय था।

“बेटा, माँ का व्रत है।

कल माँ को दो-तीन बार फोन कर लेना,

वो अकेली होंगी, भूखी होंगी।”

पापा की माँ के प्रति चिंता देखकर मन पिघल जाता।

आज जब मेरी खुद की शादी हो चुकी है,

फिर भी पापा वही कहते हैं—

“बेटा, तू भी अब तो व्रत करती है,

पर माँ को फोन ज़रूर करना,

वो आज भी भूखी रहती है।”

पापा की यह सतत चिंता देखकर लगता है,

वक्त बदला, परिस्थितियाँ बदलीं, ज़िम्मेदारियाँ बदल गईं,

पर पापा का माँ के प्रति प्रेम कभी नहीं बदला।

आज भी वैसा ही है—

अडिग, निर्मल और निश्छल।

और मैं?

ना मैंने कभी दुल्हन-सी मेहंदी लगाई,

ना सजने-सँवरने का मन बना ,

ना ही कभी किसी ने मुझे दुलार और चिंता जतायी ।

शायद माहौल ही ऐसा रहा

कि मैं अपनी ख्वाहिशें कभी कह भी न पाई।

न कभी किसी से माँगने का साहस जुटा सकी

कि मुझे भी कभी प्यार से सजाया जाए,

मेरे माथे पर भी वो  सिंदूर लगाया जाए ।

देखो ना ,सोचते-सोचते बारह बरस बीत गए।

हर साल मन में एक उम्मीद जगती है—

“इस बार मैं जरूर कहूँगी,

इस बार अपने सपनों को जी लूँगी।”

लेकिन हर साल कुछ न कुछ ऐसा हो जाता है

कि मैं कह ही नहीं पाती।

बचपन से जो रंगीन सपने संजोए थे,

वो सपने जैसे हकीकत की दहलीज़ पर आकर

धीरे-धीरे टूटते चले गए।

आज तो हाल यह है कि

ना कोई लाड़-दुलार,

ना सजना-संवरना,

और किसी को तो यह भी याद नहीं रहता

कि तीज़ कब आती है।

ऑफिस से एक फोन तक नहीं आता।

कभी-कभी मन भर आता है—

क्या यह वही त्योहार है,

जिसका इंतज़ार मैं बचपन से किया करती थी?

क्या यह वही तीज़ है,

जिसके लिए मन में इतने सपने सजाए थे?

और तब एहसास होता है—

बच्चे कितने मासूम होते हैं।

कैसे छोटी-छोटी बातों में अपना पूरा भविष्य गढ़ लेते हैं।

पर बड़े होने पर समझ आता है कि

जिंदगी हर ख्वाहिश पूरी नहीं करती…

कई बातें सिर्फ़ दिल में रह जाती हैं—

अनकही, अनपूरी, अधूरी।

बचपन से जो रंगीन सपने संजोए थे,

सपनों में जो रंग भरे थे बचपन ने,

वो रंग हकीकत की दहलीज़ पर आते-आते कहीं खो गए। 

हाँ, बच्चे सचमुच कितने मासूम होते हैं न?

क्या-क्या सपने बुन लेते हैं आने वाले दिनों के लिए…

छोटी-छोटी बातें भी उनके लिए कितनी बड़ी लगती हैं।

और वही मासूम जाने क्यों दिल के किसी कोने में गहरी छाप छोड़ जाती हैं… 

सालों बाद भी चुपचाप साथ रहती हैं।

बस मन ही मन लगता है—

कैसे एक त्योहार, जो बचपन से दिल में रचा-बसा था,

आज मेरी दुनिया में कहीं खो गया है।

छुटपन की मासूम कल्पनाएँ और आज का अधूरापन

जब आमने-सामने आते हैं,

तो मन बस यही सोचता है—

बच्चे सचमुच कितने भोले होते हैं,

क्या-क्या छोटे-छोटे ख़्वाब बना लेते हैं आने वाले दिनों के लिए…

और छोटी-सी बातें भी जाने क्यों

सारी उम्र दिल में गूंजती रह जाती हैं।

“अरे, तुम खाना रहने दो, हाथों में मेहंदी लगा लो।”

जिसमें पापा को खाना बनाना आता भी नहीं था,

फिर भी वो यही सोचते कि अगर मैं ही बच्चों के लिए कुछ बना लूँ

तो माँ को अच्छा लगेगा।

उनकी यह चिंता और मनुहार ही

हमें यह अहसास दिलाती थी

कि व्रत का असली अर्थ सिर्फ़ पूजा-पाठ नहीं,

बल्कि एक-दूसरे के लिए मन से सोचने और समर्पण करने में है।

सुनो,

ऐसा नहीं कि यह सपना बहुत बड़ा है,

या इसे पाना असंभव है।

सपने कभी इतने दूर नहीं होते

कि उन्हें छू पाना नामुमकिन लगे।

अगर आज मैं अपने मन की कह दूँ,

तो शायद कल ही वह हकीकत बन जाए।

लेकिन…

कुछ शब्द होंठों तक आकर भी रुक जाते हैं,

कुछ ख्वाहिशें आँखों में ही घुल जाती हैं।

और वही अनकही बातें

वक्त-बेवक्त दिल को चुभती रहती हैं।

हाँ, जानती हूँ—

कह दूँ तो रास्ते खुल जाएँगे,

मंज़िल करीब आ जाएगी।

जानती हूँ— कह दूँ तो सब सच हो जाएगा,

लेकिन… फिर भी…